बेइन्तिहा प्यार.. सत्य प्रेम कहानी-1

(Beintiha Pyar.. sachi prem kahani- Part 1)

This story is part of a series:

हैलो फ्रेंड्स, मेरा नाम संजय है.. मेरे दोस्त मुझे एसके कह कर बुलाते हैं।
मैंने अभी 22 मार्च को अपना 12 वीं क्लास का लास्ट एग्जाम दिया है। हम दो भाई हैं।

मैं आपको अपने प्यार की कहानी बताना चाहता हूँ। मैं सेक्स के लिए इस कहानी को नहीं लिख रहा हूँ, मैं बस अपनी लव स्टोरी शेयर करना चाहता हूँ।

मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा था। अब तक मुझे नब्बे प्रतिशत से ज्यादा ही मार्क्स मिलते रहे हैं। मेरा लड़कियों में कोई इंटरेस्ट नहीं था।

जब मैंने 12वीं में नए स्कूल में दाखिला लिया.. तो वहाँ कोई हेडब्वॉय नहीं था.. बस हेडगर्ल थी.. उसका नाम प्रीति था लेकिन सभी उसे एंजिल बुलाते थे।
प्रीति मेरी ही क्लास में पढ़ती थी। प्रीति बहुत ही सुन्दर थी, फिगर तो मुझे पता नहीं.. पर उसके होंठ बहुत पतले और लाल थे जिन्हें बस होंठों से लगा कर पीने का मन करे।
उसे देखा तो मुझे पहली बार लगा कि मुझे कुछ हो रहा है, बस उसे देखते रहने का मन करता था।

उसी के चक्कर में मैं रेगुलर स्कूल जाने लगा।

एक दिन मैं टेस्ट की तैयारी कर रहा था.. वो मेरे पास आकर बोली- एक्ससियूज मी..

मैंने उसकी तरफ देखा और बस देखता ही रह गया। वो क्या लग रही थी.. उसके बाल खुले थे.. उसकी आँखों पर पड़े बाल क्या कातिलाना लग रहे थे।
तभी उसकी आवाज़ से मैं एकदम से जैसे नींद से जागा।

प्रीति- हैलो.. क्या हुआ?
मैं- कुछ भी नहीं..
एक मिनट तक हम में से कोई नहीं बोला।

मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा- शायद आप कुछ काम से आई थीं।
प्रीति- ओह.. हाँ मुझे आपके फिजिक्स के नोट्स चाहिए.. सेकंड यूनिट के।
मैं- सॉरी आई कांट गिव यू.. मुझे भी पढ़ना है.. मैं नहीं दे सकता।

अगले दिन उसी यूनिट का टेस्ट था.. तो मैंने मना कर दिया।
प्रीति- ओके कोई बात नहीं।

फिर कुछ दिनों के बाद..

एक दिन मैं बिना यूनिफॉर्म के स्कूल गया। मुझे याद नहीं है किस कारण से मैं बिना यूनिफॉर्म के स्कूल गया था।
उसी दिन स्कूल का डायरेक्टर और मैंनेजमेंट आया हुआ था। सभी की बहुत पिटाई और फाइन लग रहा था।
मैं बहुत डर गया था।

क्लास-क्लास में जाकर जो विदाउट यूनिफॉर्म में थे.. प्रीति उसको ऑफिस में मैंनेजमेंट के पास भेज रही थी।
वह मेरी क्लास में आई.. एक तरफ की बैंच पर मैं बैठा था।
प्रीति- आपकी यूनीफ़ॉर्म कहाँ है?
मैंने डरते हुए कहा- वो वो..
प्रीति- ऑफिस में चलो अभी.. गो फास्ट..

मैं- प्लीज़ हेल्प मी.. मुझे मत भेजो।
प्रीति- आपने की थी मेरी हेल्प?
मैं- आपने कब मांगी थी मेरी हेल्प?
प्रीति- नोट्स भूल गए?
मैं- ये लो..
मैंने तुरन्त नोट्स निकाल दिए।

उसने गुस्से से चिल्लाते हुए नोट्स एक तरफ फेंक दिए- चुपचाप ऑफिस चलो..

मैं ऑफिस में गया, मुझे 100 रूपए फाइन लगा.. पिटाई नहीं हुई.. क्योंकि वहाँ मैथ की टीचर थीं और चूंकि मैं पढ़ाई में अच्छा था.. तो उन्होंने कहा- सर ये डेली यूनिफॉर्म में आता है.. आज ही नहीं आया।
उस दिन से मुझे प्रीति से बहुत चिढ़ हो गई।

मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा था। मैं एक महीने में ही टॉप के बच्चों में आने लगा, मुझे क्लास का मॉनीटर बनाया गया।

एक दिन मैं मैथ की फेयर नोटबुक चैक कर रहा था.. उस दिन प्रीति नोट बुक घर पर भूल आई थी, मैं भी बदला लेना चाहता था।
मैं- नोट बुक?
प्रीति- वो मैं वो.. मैं घर पर भूल आई हूँ, मैंने सारे सम कर रखे हैं।
मैं- तूने कहा.. मैं मान लूँ.. दिखा?
प्रीति- बताया तो नोटबुक घर पर है।
मैं- चुपचाप हाथ ऊपर कर और पूरे पीरियड खड़ी रह!

इस प्रकार हम एक-दूसरे से बदला लेने का मौका ढूँढते रहते, हमारा लगभग रोज ही झगड़ा होता रहता।

एक बार मैं बीमार पड़ गया, मैं 5-6 दिन बाद स्कूल गया।
तब मैंने देखा कि मुझे देखते ही प्रीति बहुत खुश हुई.. मुझे अजीब सा लगा।
मुझे पता नहीं क्या हुआ मैंने भी उसकी तरफ स्माइल दी।

पर यह भी ज्यादा देर नहीं रहा, छुट्टी होते-होते हमारा वही पहले वाला झगड़ा शुरू हो गया।
ऐसा ही चलता रहा..

फिर एक दिन मैं गेम पीरिएड में खेलने की जगह कमरे में आया और बैठ गया।
मैंने देखा कमरे में मैं और प्रीति ही हैं तो मैं उठ कर बाहर जाने लगा।

प्रीति ने कमेन्ट पास किया- डर गए..
मैं- किससे?
प्रीति- मुझसे..
मैं- तुझसे और मैं क्यों डरने लगा भला?
प्रीति- फिर बाहर क्यों जा रहे हो?
मैं- ऐसे ही मेरा मन नहीं है.. तेरे साथ रूम में पढ़ने का!

और मैं वहाँ से आ गया.. फिर पता नहीं मुझे क्या हुआ.. मैं रूम में फिर से गया और जाकर उससे आगे वाले बैंच पर बैठ गया और बोला- ले देख, तेरे से नहीं डरता मैं।

तभी प्रीति मेरे पास आकर बैठ गई।

मैं थोड़ा सा नर्वस हो गया.. पर पता नहीं क्यों.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। उसे टच करने का मन कर रहा था।

मुझे अजीब सा नशा होने लगा, मैं जानबूझ कर प्रीति को छूने के मौके ढूँढने लगा.. वो भी इस बात को नोटिस करने लगी।

सोमवार का दिन था.. मैं घर से रेडी हो कर स्कूल गया.. तो देखा रूम में मेरा दोस्त सचिन उसकी गर्लफ्रेण्ड सीमा एक-दूसरे को किस कर रहे थे।
मुझे देख कर एक बार तो वे दोनों डर गए.. पर मैंने जैसे ही उनकी तरफ देख कर मुस्कुराया.. तो वे दोनों फिर से लग गए। तभी वहाँ प्रीति आ गई.. अब सीमा और सचिन डर गए और वहाँ से चले गए।

मुझे पता नहीं क्या हुआ.. मैं प्रीति के पास गया- प्रीति, मुझे आपसे कुछ कहना है!
प्रीति गुस्से से बोली- क्या कहना है?
मैं- यार, गुस्सा क्यों होती हो?

प्रीति- नहीं होती.. बोल क्या बात है?
मैं- मुझे पता नहीं क्या हो गया है.. मुझे ना आपको टच करना.. आकर साथ रहने और आपको देखने का मन करता है।
प्रीति बहुत गुस्से से मेरी तरफ देखते हुए बोली- क्या बकवास है ये?

मैं अपने घुटनों पर बैठ गया और उसकी तरफ एक हाथ करके बोला- आई थिंक.. आई लव यू प्रीति..
प्रीति बिना कुछ बोले वहाँ से चली गई।
फिर वो दो दिन स्कूल भी नहीं आई।

मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि मुझे तब क्या हो गया था.. मैंने क्यों प्रपोज़ किया उसे.. और किया भी तो इतने घटिया तरीके से क्यों किया।
जब वो आई तो मैं उसके पास गया- सॉरी प्रीति..
प्रीति- इट्स ओके..

फिर मैं वहाँ से चला आया.. अब मैं खोया-खोया सा रहने लगा.. किसी से बात करने का मन ही नहीं होता।
दो-तीन हफ्ते ऐसे ही निकल गए, फिर मैं कुछ ठीक सा हुआ.. मैंने अपने आपको सम्भाला।

मुझे पता चला कि कल प्रीति का बर्थडे है, मुझे बहुत ख़ुशी हुई.. सोचा कल अच्छा सा गिफ्ट लेकर दूँगा।
फिर गुस्सा आया.. क्यों दूँ मैं गिफ्ट.. नहीं देता।

अगले दिन जब मैं स्कूल गया तो प्रीति क्या लग रही थी उसने लाल सूट डाल रखा था.. बहुत मस्त लग रही थी।
मैं तो बस उसे देखता ही रह गया, उसके पतले-पतले होंठ उसकी छोटी-छोटी नुकीली चूचियाँ.. जिनके निप्पल साफ उठे हुए दिख रहे थे।

उसने मेरी तरफ देख कर स्माइल की.. मैं भी उसके पास गया।
मैं- हैप्पी बर्थ डे..
प्रीति- थैंक्स..
मैं- थैंक्स से काम नहीं चलेगा।
प्रीति- तो फिर..
मैं- पार्टी देनी पड़ेगी।
प्रीति- लो आप मिठाई खाओ।

उसने मेरी तरफ एक मिठाई का डिब्बा किया.. मैंने उसमें से एक पीस उठाया और उसे खिलाने लगा।
वो मना करने लगी.. पर मैंने उसे जबरदस्ती खिला दी।
फिर उसने भी एक पीस उठा कर मुझे खिलाया।

तभी प्रीति बोली- मेरा गिफ्ट?
मैं- गिफ्ट?
प्रीति- मेरे लिए क्या गिफ्ट लाए हो.. मुझे अभी चाहिए।
मैं- पर..
प्रीति- क्या पर.. मुझे अभी चाहिए।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, मेरी नजरें उसके चेहरे पर थीं।

तभी अचानक मुझे पता नहीं क्या हुआ.. मैंने अपने होंठों को उसके होंठों पर रख दिए और उसके होंठों को चूसने लगा।
उसने मुझे धक्का दे दिया- यह क्या बेहूदगी है?
मेरा चेहरा शर्म से नीचे हो गया।

वो गुस्से से मेरी तरफ देखती हुई प्रिंसिपल के रूम में चली गई, मेरी फट कर हाथ में आ गई।

साथियो, मेरी यह कहानी एकदम सच पर आधारित है और हो सकता है कि सेक्स की कमी के कारण आपको कम मजा आ रहा हो..

आप अपने ईमेल भेजिएगा।
कहानी जारी है।
[email protected]

What did you think of this story??

Comments

Scroll To Top