बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया-1

(Bahut Kuchh Khoya Bahut Kuchh Paya-1)

हैलो दोस्तो, मेरा नाम एस के चौधरी है और मैं आगरा से हूँ।
मेरी उम्र 21 वर्ष है मेरा रंग गोरा है यानि कि दिखने में आकर्षक बन्दा हूँ।
मैंने आप लोगों की बहुत सारी सेक्स स्टोरी पढ़ी हैं.. तो मुझे भी अपनी स्टोरी आप सबको बताने का मन हुआ।

मैं आपको अपनी सच्ची स्टोरी लिख रहा हूँ.. अगर मुझसे कोई ग़लती हो तो माफ़ कर देना।

मेरी यह कहानी काफ़ी समय पहले की है जब मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरा स्कूल घर से करीब एक किलोमीटर दूर था.. तो स्कूल आने-जाने में परेशानी होती थी।
मैंने पापा को साइकिल के लिए बोला.. तो पापा ने मुझे एक नई साइकिल दिला दी। वो साइकिल छोटी थी.. उसे चलाने में मुझे बहुत मजा आता था। अब मैं रोजाना साइकिल से स्कूल जाता था।

कुछ दिन बाद मेरी साइकिल की चाबी स्कूल में कहीं गिर गई और मेरी चाभी स्कूल की ही एक लड़की को मिल गई।

यह बात मुझे मेरे दोस्त ने बताई कि तेरी साइकिल की चाभी उसके पास है वो अन्य किसी कक्षा में पढ़ती थी, उसका नाम राजेश्वरी था.. तो मैं उसके पास अपनी चाभी लेने गया।
उसके पास जाते ही मैंने अपनी चाभी माँगी.. तो उसने इठला कर कहा- तुम्हें चाभी तो मिल जाएगी लेकिन एक शर्त पर..

मैंने पूछा- बता क्या..

उसने कहा- तुम मुझे रोजाना लंच में अपनी साइकिल चलाने दोगे।

मैंने ‘हाँ’ कर दी।

उसे देख कर मैं क्या.. कोई भी किसी चीज़ के लिए ‘ना’ नहीं कर सकता था। वो एक बहुत सुंदर और सेक्सी.. हॉट माल थी।

उसके गुलाबी गाल.. पतले-पतले गुलाबी रसभरे होंठ.. छोटे-छोटे सन्तरे जैसे मम्मे और मटकती हुई गाण्ड.. मानो घायल कर रही हो। सब लड़के उसे ही घूरते रहते थे।

उसे भी साइकिल का बहुत शौक था.. इसलिए उसने मुझसे दोस्ती कर ली।

दूसरे दिन से वो रोजाना लंच में मेरी साइकिल को स्कूल के मैदान में चलाती रहती। उस साइकिल के वजह से हम धीरे-धीरे काफ़ी पास आ चुके थे।

अब मैं उससे काफ़ी मिलता-जुलता था और बात भी करता था।
हम दोनों की दोस्ती अब आगे बढ़ने लगी और इसी बहाने से मैं उसे बहुत बार चुम्बन भी कर चुका था। मुझे जब भी मौका मिलता.. चुम्बन तो कर ही लेता और उसकी चूचियों भी दबा देता था।

उसकी छोटी सी चीकू जैसी चूचियाँ बहुत सख्त थीं.. हाथ लगाते ही वो दर्द से उछलने लगती थी।

अब धीरे-धीरे हमारी दोस्ती के चर्चे स्कूल में चलने लगे थे। जब ये मुझे लगा कि हमारी लव स्टोरी अब मशहूर हो रही है तो मैंने राजेश्वरी को अपना मोबाइल नम्बर दिया और उससे स्कूल में बात करना बंद कर दिया।

अब हम केवल फ़ोन पर ही बात करते थे.. और उसने अब मेरी साइकिल चलाना भी बंद कर दिया। जिससे कि कोई हमारी दोस्ती के बारे में कुछ न बोले।

अब हमारी लव स्टोरी बहुत आगे बढ़ चुकी थी.. और अब हमें एक-दूसरे के बिना रहना मुश्किल हो रहा था।
हम दोनों जब तक एक-दूसरे के सामने रहते.. खुश रहते और अलग होते ही उदास हो जाते और एक-दूसरे की याद आने लगती थी।

यह देख कर मेरे दोस्त ने मुझसे कहा- उदास रहने और रोने से अच्छा है कि तुम दोनों कहीं भाग जाओ और शादी कर लेना और एक साथ ही रहना।

तो मैंने उससे ये सब करने के लिए मना कर दिया.. लेकिन घर जाके मैं सारी रात ये ही सोचता रहा कि क्या ऐसा करना सही रहेगा।

अब मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ.. तो मैंने राजेश्वरी को फ़ोन किया और उसे घर से भागने का विचार बताया तो पहले तो उसने भी मना कर दिया फिर इस बारे में दूसरे दिन बताने को कहा।

फिर हम दोनों ने फोन पर बातचीत खत्म की.. और सो गए। दूसरे दिन स्कूल से आकर रात को फिर बात की.. तो आज राजेश्वरी मेरे साथ भागने के लिए राज़ी हो गई।

अब हम दोनों भागने का प्लान बनाने लगे। तभी दूसरे दिन किसी ने राजेश्वरी के पापा को हमारी लव स्टोरी के बारे में बता दिया और उन्होंने राजेश्वरी को बहुत पीटा था और उसको मुझसे मिलने या बात करने को मना कर दिया। लेकिन रात को सभी के सो जाने के बाद हम दोनों फोन पर बात करते थे।

उस दिन पिटाई के बाद उसी रात को उसका फ़ोन आया और उसने सारी बातें मुझे बताईं.. तो मुझे उसके पापा पर बहुत गुस्सा आने लगा। मैं उसे भाग चलने के लिए बोलने लगा और वो भी घर से भाग जाना चाहती थी।

अब हमने स्कूल से ही भाग जाने का प्लान बना लिया और दूसरे दिन सुबह मैंने अपने बैग से किताबें निकाल कर छुपा दीं और बैग में अपने कपड़े रख लिए। मैंने पापा के रखे हुए पैसे भी चोरी कर लिए और स्कूल के लिए निकल गया।

उधर राजेश्वरी ने भी अपने बैग से किताबें निकाल कर कपड़े रख लिए और अपनी माँ के ज़ेवर और घर से जितने भी पैसे उसके हाथ लगे.. उसने ले लिए।

अब हम दोनों स्कूल से पहले एक चौराहे पर मिले। इस काम में मेरा एक दोस्त हमारे साथ था।

उसे हमारे बारे में सब पता था। उसने हम दोनों को अपनी बाइक से रेलवे स्टेशन छोड़ा और कॉलेज के लिए चला गया।

मैंने दिल्ली के लिए दो टिकट लीं और प्लेटफार्म पर खड़े होकर ट्रेन का इन्तजार करने लगे। तभी राजेश्वरी ने मुझे अपने पैसे और अपनी माँ के ज़ेवर मुझे दिए.. जो वो अपने घर से चुरा कर लाई थी।

अब हमारे पास करीब 25000 रूपए और ज़ेवर थे। कुछ देर बाद ट्रेन आई और हम दोनों ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए निकल गए।

मैं पहले भी कई बार अपने मामा के यहाँ दिल्ली जा चुका था। मुझे दिल्ली के बारे बहुत जानकारी थी और कहीं तो मैं कभी गया ही नहीं था.. इसीलिए मैंने दिल्ली जाना ही अच्छा समझा।

अब ट्रेन आगरा से दिल्ली करीब 4 घंटे में पहुँच गई। दिल्ली आने पर हम ट्रेन से उतरे और स्टेशन से बाहर आगए। हम दोनों ने सुबह से कुछ नहीं खाया था।

अब 3 बजे थे और भूख भी बहुत जोरों से लगी थी.. तो हमने एक फास्ट फूड की दुकान पर जाकर डोसा और पेस्ट्री वगैरह खाई और बस में बैठ कर दोनों दिल्ली घूमने चल दिए। पहले हम कुतुबमीनार पर गए.. फिर इंडिया गेट पर गए और वहीं पर घूमते रहे और मस्ती करते रहे।

अब हमको घूमते हुए रात के 11 बाज चुके थे और हम बुरी तरह थक चुके थे। अब हम खाना ख़ाकर सोना चाहते थे.. तो हम दोनों चल दिए और होटल ढूँढ़ने लगे। थोड़ी चलने के बाद हमको एक होटल मिला और हमने 500 रुपए में एक रात के लिए कमरा बुक किया। अपना सामान कमरे में रख कर खाना खाने के लिए बाहर एक ढाबा पर आ गए और खाना खा कर फिर होटल में चले आए। रिसेप्शन से अपने कमरे की चाभी ली और कमरे में आ गए।

कमरे में आने के बाद मैंने राजेश्वरी को अपनी बाँहों में भर लिया और उसे ख़ुशी से चुम्बन करने लगा।

अब हम दोनों बहुत खुश थे.. और क्यों न हों.. अब हम साथ थे और आज़ाद भी थे। अब हमको कोई रोकने वाला नहीं था।

राजेश्वरी ने खुद को मुझसे छुड़ाया और कपड़े बदलने के लिए बोला.. तो मैं नहाने के लिए चला गया। जब नहा कर बाथरूम से बाहर आया तो देखा कि राजेश्वरी सो चुकी थी।
मैं उसके पास लेट गया और थोड़ी देर मैं मुझे भी नींद आ गई।

दूसरे दिन सुबह करीब 8 बजे मेरी नींद खुली तो राजेश्वरी नहा कर बाहर आई थी और नंगी होकर अपने शरीर को तौलिया से पौंछ रही थी। उसका नंगा बदन देख मेरी आँखों में वासना आ गई। उसका दूध जैसा गोरा बदन और उसकी छोटे-छोटे चीकू जैसी चूचियों और चिकने और बड़े-बड़े चूतड़ देखता ही रह गया।

यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !

उसका साइज़ 30-26-30 था.. उसे देख कर मैंने कहा- वाह भगवान.. क्या चीज़ बनाई है आपने.. बिल्कुल स्वर्ग की अप्सरा जैसी लग रही है।

उसने मेरी आवाज़ सुनते ही तौलिया से अपना बदन ढकना चाहा.. तो मैं बोला- अब मैंने सब देख लिया.. अब क्या फायदा छुपाने से..

तो वो मेरी तरफ देख कर थोड़ा सा मुस्कराई और अपने कपड़े पहनने लगी।

मैं जल्दी से बिस्तर से खड़ा हुआ और उसे बाँहों में भर कर उसे बिस्तर पर डाल दिया। मैं उसके ऊपर लेट गया और उसके मुँह से मुँह लगा कर चुम्बन करने लगा।
मैं उसकी नरम चूचियों को सहलाने लगा था। उसका गोरा बदन मलाई की तरह था थोड़ा सा दबाते ही नीला पड़ जाता था।

मैंने उसकी चूचियों को ज़ोर से दबा दिया तो उसकी दर्द के मारे चीख निकल गई। उसने गुस्से में मुझे धक्का दे कर अपने ऊपर से हटा दिया और खड़े होकर कपड़े पहनने लगी।

मैं भी गुस्से में फ्रेश होने चला गया। अब मैं फ्रेश होते-होते राजेश्वरी के बारे में सोचने लगा तो मेरा लण्ड खड़ा होने लगा।
मेरा लण्ड करीब 6 इंच लंबा और 1.5 इंच मोटे व्यास का था। आज तक मैंने न तो किसी की चुदाई की थी और न ही मुठ्ठ मारी थी। आज पहली बार मैंने राजेश्वरी का नाम लेकर मुठ्ठ मारने लगा.. आह्ह.. मुझे मुठ्ठ मारने में बहुत मजा आ रहा था और कुछ देर बाद मेरा रस निकल गया।

मुझे बड़ा अच्छा महसूस होने लगा। मैंने सोचा जब मुट्ठ मारने में इतना मजा आया है.. तो चूत मारने में तो बहुत मजा आएगा।
मैं अब राजेश्वरी को चोदने की सोचने लगा था.. लेकिन राजेश्वरी मुझे हाथ भी नहीं रखने देती थी।

आप अपने विचारों से अवगत कराने के लिए मुझे ईमेल कीजिएगा।
कहानी जारी है।

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