रेल गाड़ी में 69

extrafuun 2011-04-03 Comments

नमस्कार…मैं एक बहुत ही हंसमुख स्वभाव का पढ़ा लिखा इन्सान हूँ और एक अच्छे परिवार से हूँ।

यह एक सच्ची घटना है।

मैं एक ट्रेन से सफ़र कर रहा था, मुझे विशाखापत्तनम से कोलकाता जाना था पर मेरी सीट कन्फर्म नहीं थी।

मैं द्वीतीय श्रेणी की ए सी बोगी में टी टी को बोल कर चढ़ गया। उसी बोगी में एक लड़की अपने पापा के साथ चढ़ी, क्या कमाल की माल थी वो लड़की।

अन्दर कहीं भी बैठने का जगह नहीं थी। सामान रख कर हम तीनों जने एक तरफ़ खड़े थे। उनकी भी बर्थ कन्फर्म नहीं थी, यह बात मुझे अंकल से बात करके पता चली।

उसका नाम निशा था जो मुझे बाद में पता चला था। मैं निशा को कनखियों से देख रहा था और मैंने देखा कि वह भी मुझे बीच-बीच में देख रही है।

एक बार हम दोनों की नजरें मिली। मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया तो वह भी जवाब में मुस्कुरा दी।

मैंने मन ही मन सोचा- बेटा, लड़की हंसी तो फंसी।

बस फिर क्या था, यह सोचते ही मेरा लंड एकदम से तन कर खड़ा हो गया और पैंट का जिप वाला जगह फ़ूल गया। मैं बार बार लण्ड को दबा कर सैट कर रहा था लेकिन वो साला आज तो चूत मारने की मूड में था इसलिए बस तन कर खड़ा था।

मैंने देखा कि निशा भी अब यह सब देख रही थी और मुस्कुरा रही थी।

निशा के पापा टी टी की सीट, जो गेट के पास थी, उस पर बैठ गए थे। उनकी उम्र कुछ ज्यादा थी या फिर कुछ बीमार से थे। वो आँखें बंद करके बैठे थे।

टी टी जब हमारे बोगी में आया तो मैं उसके पास गया और बोला- सर एक सीट दे दो ना प्लीज़ ! जो भी आपको पैसे लेने हों, मैं दे दूंगा।

टी टी ने कहा- बहुत मुश्किल है क्योंकि अभी तक आर ए सी क्लीयर नहीं हुई है।

मैंने टी टी के हाथ में एक 500 का नोट थमाया और बोला- कोई बात नहीं है, आप देख लो, हो जाये तो बता देना।

टी टी अपने दांत दिखा कर चला गया।

मैंने निशा से अब बात करनी की सोची, मैंने बोला- क्या भीड़ होने लग गई है आजकल रेल में भी ! देखो सीट नहीं मिल रही है।

मैंने पूछा- वैसे आप लोगों को जाना कहाँ है?

उसने कहा- हमें कोलकाता जाना है। टिकट कॉन्फर्म नहीं हुई और अभी हॉस्टल से छुट्टी हो गई है तो जाना जरुरी था।

फिर उसने बताया कि वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। उसके साथ उसके पापा हैं, जो उसको लेने आये हैं। लेकिन उनको थोड़ा नशा करने की आदत है, इसलिए उनको मैंने बैठा दिया है।

मैंने पूछा- टिकट कॉन्फर्म होने की उम्मीद नहीं दिख रही है?

उसने कहा- आप बात करके देखो, शायद कुछ हो।

फिर हम दोनों एक दूसरे के बारे में बातें करने लग गए। वो मुझे बातचीत में बहुत अच्छी लगी, उसकी हंसी बहुत ही मन मोहक थी। अब धीरे धीरे वह मुझसे खुलने लगी थी।

मैंने भी मजाक मजाक में पूछा- तुम लोग हॉस्टल में तो खूब मौज करते होंगे ! वैसे क्या क्या करते हो तुम लोग हॉस्टल में?

वो थोड़ा सा शरमा गई।

मैंने कहा- कोई बात नहीं, यदि तुमको अच्छा नहीं लगता बताने को तो मत बताओ।

निशा बोली- ऐसी कोई बात नहीं है। बस थोड़ी शर्म आ रही है।

मैंने कहा- शर्म की छोड़ो निशा, हमें अभी यहाँ शायद रात भी कटनी पड़े। तो थोड़ा सा टाइम पास कर लेते हैं।

वो बोली- बात तो आपकी सही है लेकिन चूँकि आज पहली बार हम और आप से मिले हैं तो थोड़ी झिझक है। वैसे आप इन्सान बहुत अच्छे हो।

फिर वह अपनी हॉस्टल की बात बताने लगी कि कैसे वो सब मस्ती करते हैं, रात को खाना खाने के बाद एक बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड बन जाते है और प्यार मोहब्बत करते हैं। उसमें सब कुछ करते है केवल एक कार्यक्रम को छोड़ के।

मुझे तो ये सब बातें सुन कर एकदम से नशा हो गया और मेरा जो लण्ड एक बार शांत हो गया था, फिर से फड़फ़ड़ाने लग गया।

तब तक रात के 12 बजने वाले थे।

अचानक से टी टी ने आया और मुझे एक तरफ़ ले जा कर बोला- सेकेण्ड ए सी में एक ही सीट है ऊपर वाली, लेकिन पैसा ज्यादा लगेंगे।

मैंने कहा- कोई बात नहीं, आप सीट दे दो।

उसने सीट मुझे दे दी।

निशा की तरफ मैंने देखा और मुस्कुरा दिया और वो भी मुझे देख कर मुस्करा दी।

मैंने बोला- निशा, चलो हम चलते हैं और तुम अपने पापा को भी जगा दो।

उसने अपने पापा को उठाया और बोली- इन्होंने ने टी टी से बड़ी मुश्किल से एक सीट ली है और आप कहें तो हम भी चलते हैं।

वो थोड़ी नींद में थे और कोई चारा न देख कर बोले- चलो।

हम सीट पर गए और देखा कि नीचे वाली सीट पर एक दस साल का बच्चा सोया हुआ है।

हमने लाइट जलाई तो उसके पापा उठ गए। हमने हमारी परेशानी बताई कि हमारे साथ बुजुर्ग हैं तो उन्होंने कहा- ठीक है, बच्चा अकेले सोया है तो आप एक जना उसके पास बैठ जाये, इससे मुझे भी फिकर नहीं होगी।

निशा के पापा ने कहा- मैं ऊपर नहीं जा सकता, मैं नीचे बैठा हूँ। आप दोनों ऊपर वाली सीट में चले जाओ।

क्योंकि सीट मेरी थी, शायद यह सोच कर उन्होंने ऐसा बोला क्योंकि उनके पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं था।

अंधे को क्या चाहिए दो आँखें ! और मेरे लंड को भी क्या चाहिए था निशा का साथ, जिसका इंतजाम होते हुए मुझे दिख रहा था।

मैंने कहा- ठीक है अंकल, जैसा आप बोलो।

फिर हम दोनों ऊपर आ गए, एक दूसरे के सामने होकत बैठ गए पाँव को लम्बा करके।

मैंने नाइट लेम्प जला दिया था।

मैंने बोला- निशा, कोई परेशानी नहीं है ना ऐसे बैठने में?

बोली- नहीं जी, आपके साथ क्या परेशानी?

मैं बोला- तो ठीक है, फिर सो जाते हैं क्योंकि रात काफी हो गई है।

हम दूसरे की तरफ चूतड़ करके लेट गए। निशा के चूतड़ जब मेरे घुटने पर लगे तो एक बार वो दूर हट गई।

मैंने बोला- कोई बात नहीं निशा, आराम से सो जाओ, क्या फर्क पड़ता है।

वो बोली- ठीक है।

मैंने बोला- अच्छा मैं घूम कर सो जाऊँ तो कोई दिक्कत नहीं है ना?

उसने कहा- आपको जो अच्छा लगे, जैसे अच्छा लगे, सो जाइए।

मैंने झट से घूम कर निशा के चूतड़ों में अपना लंड सटा दिया। लंड पूरा गरम हो चुका था। उसे भी शायद बहुत अच्छा लगा क्योंकि उसने भी अपने टांगें और फैला दी। मैंने उसके कूल्हों के बीच में अपने लंड का दबाव बना कर उसके दोनों पैरों को जोर से पकड़ लिया। उसने लेगिंग पहनी हुई थी जिससे उसकी गांड एकदम से कसी हुई मस्त लग रही थी।

मैंने उसके चूतरों पर हल्के से हाथ फेरा तो उसने भी अपनी गांड को मटका कर जवाब दिया।

मैंने धीरे से बोला- निशा जान, तू मेरे पास आ जा ना।

वो बोली- डार्लिंग, मैं भी तो तड़प रही हूँ।

और वो सीधे मेरे पास आकर लेट गई।

फिर हमने तुरन्त चूमाचाटी शुरु कर दी। वो तो पूरी तरह से गर्म थी। मैंने उसकी एक चुच्ची निकाल कर चूसना शुरु किया तो उसको जैसे करेंट लग गया, वो पागल सी होने लगी और मेरा लंड पर हाथ रख कर जोर से हिलाने लग गई।

फिर कुछ देर बाद हम दोनों 69 पोजीशन में आ गए और मैं उसकी चूत लेगिंग के ऊपर से ही और वो ज़िप खोल कर मेरा लंड चूसने लगी।

मैं तो कब से गर्म था, मेरे लंड से एकदम पानी निकल गया। उसने सारा माल अपने मुँह में ले लिया और चाट चाट कर साफ़ करने लगी।

अब मैंने भी उसकी लेगिंग के अन्दर हाथ घुसाया यर चूत को उंगली से मसल मसल कर उसका पानी निकाल दिया।

मैंने बोला- निशा, आज तो मजा आ गया जान। तुमने तो मेरी लाइफ बना दी।

वो मुस्करा दी।

फिर हम दोनों एक दूसरे को किस करने लग गए।

इतने में मेरा लंड फिर तन गया पर मैं इससे ज्यादा और कुछ नहीं कर सकता था। बस पूरी रात हमने चूमाचाटी में बिता दी, एक मिनट के लिए भी नहीं सोये।

मेरी कहानी पर अपने विचार मुझे इमेल में लिखिए।

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